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Thursday, August 09, 2012

Baalkaand - Part I

बालकाण्ड - १

 

जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन।
करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥१॥
नील सरोरुह स्याम तरुन अरुन बारिज नयन।
करउ सो मम उर धाम सदा छीरसागर सयन॥३॥
कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुना अयन।
जाहि दीन पर नेह करउ कृपा मर्दन मयन॥४॥
बंदउ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥५॥
बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ।
सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित॥१४(घ)॥
प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानघन।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥१७॥




चौ.
सादर सिवहि नाई अब माथा। बरन‍उँ बिसद राम गुन गाथा॥
संबत सोरह सै एकतीसा। कर‍उँ कथा हरि पर धरि सीसा॥२॥
नौमी भौम बार मधु मासा। अवधपुरीं यह चरित प्रकासा॥
जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं। तीरथ सकल तहाँ चलि आवहिं ॥३॥
असुर नाग खग नर मुनि देवा। आइ करहिं रघुनायक सेवा॥
जन्म महोत्सव रचहिं सुजाना। करहिं राम कल कीरति गाना॥४॥

दो.
मज्जहिं सज्जन बृंद बहु पावन हरजू नीर।
जपहिं राम धरि ध्यान उर सुंदर स्याम सरीर॥३४॥


चौ.
अवधपुरीं रघुकुलमनि राऊ। बेद बिदित तेहि दसरथ नाऊँ॥
धरम धुरंधर गुननिधि ग्यानी। हृदयँ भगति मति सारँगपानी॥४॥
एक बार भूपति मन माहीं। भै गलानि मोरें सुत नाहीं॥
गुर गृह गय‍उ तुरत महिपाला। चरन लागि करि बिनय बिसाला॥१॥
निज दुख सुख सब गुरहि सुनाय‍उ। कहि बसिष्ठ बहु बिधि समुझाय‍उ॥
धरहु धीर होइहहिं सुत चारी। त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी॥२॥

दो.
कौसल्यादि नारि प्रिय सब आचरन पुनीत।
पति अनुकूल प्रेम दृढ़ हरि पद कमल बिनीत॥१८८॥


चौ.
सृंगी रिषिहि बसिष्ठ बोलावा। पुत्रकाम सुभ जग्य करावा॥
भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें। प्रगटे अगिनि चरू कर लीन्हें॥३॥
जो बसिष्ठ कछु हृदयँ बिचारा। सकल काजु भा सिद्ध तुम्हारा॥
यह हबि बाँटि देहु नृप जाई। जथा जोग जेहि भाग बनाई॥४॥
एहि बिधि गर्भसहित सब नारी। भईं हृदयँ हरषित सुख भारी॥
जा दिन तें हरि गर्भहिं आए। सक्ल लोक सुख संपति छाए॥३॥

दो.
जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल।
चर अरु अचर हर्षजुत राम जनम सुखमूल॥१९०॥


चौ.
नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥
मध्य दिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा॥१॥
सीतल मंद सुरभि बह बा‍ऊ। हरषित सुर संतन मन चा‍ऊ॥
बन कुसुमित गिरिगन मनिआरा। स्रवहिं सकल सरिताऽमृतधारा॥२॥
सो अवसर बिरंचि जब जाना। चले सकल सुर साजि बिमाना॥
बरषहिं सुमन सुअंजुलि साजी। गहगहि गगन दुंदुभी बाजी॥


छं.

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥१॥
कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता॥
करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता।
सो मम हित लागी जन अनुरागी भय‍उ प्रगट श्रीकंता॥२॥
ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै।
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै॥
उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहा‍ई मातु बुझा‍ई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै॥३॥
माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा॥
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा॥४॥

दो.

गृह गृह बाज बधाव सुभ प्रगटे सुषमा कंद।
हरषवंत सब जहँ तहँ नगर नारि नर बृंद ॥१९४॥


चौ.
कैकयसुता सुमित्रा दोऊ। सुंदर सुत जनमत भैं ओऊ॥
वह सुख संपति समय समाजा। कहि न सक‍इ सारद अहिराजा॥१॥
अवधपुरी सोह‍इ एहि भाँती। प्रभुहि मिलन आइ जनु राती॥
देखि भानु जनु मन सकुचानी। तदपि बनी संध्या अनुमानी॥२॥
अगर धूप बहु जनु अँधिआरी। उड़‍इ अबीर मनहुँ अरुनारी॥३ (क)॥
कौतुक देखि पतंग भुलाना। एक मास तेइँ जात न जाना॥४ (ख)॥

दो.
मास दिवस कर दिवस भा मरम न जान‍इ कोइ।
रथ समेत रबि थाके‍उ निसा कवन बिधि होइ॥१९५॥


चौ.
कछुक दिवस बीते एहि भाँती। जात न जानिअ दिन अरु राती॥
नामकरन कर अवसरु जानी। भूप बोलि पठए मुनि ग्यानी॥१॥
जो आनंद सिंधु सुखरासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी॥
सो सुख धाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक बिश्रामा॥३॥
बिस्व भरन पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत अस होई॥
जाके सुमिरन तें रिपु नासा। नाम सत्रुहन बेद प्रकासा॥४॥

दो.

लच्छन धाम राम प्रिय सकल जगत आधार।
गुरु बसिष्ट तेहि राखा लछिमन नाम उदार॥१९७॥


चौ.
बालचरित अति सरल सुहाए। सारद सेष संभु श्रुति गाए॥१ (क)॥
भए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता॥
गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल बिद्या सब आई॥२॥
बिद्या बिनय निपुन गुन सीला। खेलहिं खेल सकल नृपलीला॥३ (ख)॥
करतल बान धनुष अति सोहा। देखत रूप चराचर मोहा॥४ (क)॥

दो.
कोसलपुर बासी नर नारि बृद्ध अरु बाल।
प्रानहु ते प्रिय लागत सब कहुँ राम कृपाल॥२०४॥



मंगल भवन अमंगल हारी।
द्रवहु सुदसरथ अचर बिहारी॥


चौ.
यह सब चरित कहा मैं गाई। आगिलि कथा सुनहु मन लाई॥
बिस्वामित्र महामुनि ग्यानी। बसहिं बिपिन सुभ आश्रम जानी॥१॥
जहँ जप जग्य जोग मुनि करहीं। अति मारीच सुबाहुहि डरहीं॥२ (क)॥
गाधितनय मन चिंता ब्यापी। हरि बिनु मरहिं न निसिचर पापी॥
तब मुनिबर मन कीन्ह बिचारा। प्रभु अवतरेउ हरन महि भारा॥३॥
एहूँ मिस देखौं पद जाई। करि बिनती आनौं दोउ भाई॥४ (क)॥

दो.
बहुबिधि करत मनोरथ जात लागि नहिं बार।
करि मज्जन सर‍ऊ जल गए भूप दरबार॥२०६॥


चौ.
तब मन हरषि बचन कह रा‍ऊ। मुनि अस कृपा न कीन्हिहु का‍ऊ॥
केहि कारन आगमन तुम्हारा। कहहु सो करत न लाव‍उँ बारा॥४॥
असुर समूह सतावहिं मोही। मैं जाचन आय‍उँ नृप तोही॥
अनुज समेत देहु रघुनाथा। निसिचर बध मैं होब सनाथा॥५॥

दो.
देहु भूप मन हरषित तजहु मोह अग्यान।
धर्म सुजस प्रभु तुम्ह कौं इन्ह कहँ अति कल्यान॥२०७॥

सो.
पुरुषसिंह दोउ बीर हरषि चले मुनि भय हरन।
कृपासिंधु मतिधीर अखिल बिस्व कारन करन॥२०८ (ख)॥


चौ.
अरुन नयन उर बाहु बिसाला। नील जलज तनु स्याम तमाला॥
कटि पट पीत कसें बर भाथा। रुचिर चाप सायक दुहुँ हाथा॥१॥
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। बिस्वामित्र महानिधि पाई॥२(क)॥
चले जात मुनि दीन्हि देखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई॥
एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा॥३॥
तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही। बिद्यानिधि कहुँ बिद्या दीन्ही॥४(क)॥

दो.
आयुध सर्ब समर्पि कै प्रभु निज आश्रम आनि।
कंद मूल फल भोजन दीन्ह भगति हित जानि ॥२०९॥


चौ.
प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई॥१ (क)॥
सुनि मारीच निसाचर क्रोही। लै सहाय धावा मुनिद्रोही॥
बिनु फर बान राम तेहि मारा। सत जोजन गा सागर पारा॥२॥
पावक सर सुबाहु पुनि मारा। अनुज निसाचर कटकु सँधारा।
मारि असुर द्‌विज निर्भयकारी। अस्तुति करहिं देव मुनि झारी॥३॥
तब मुनि सादर कहा बुझाई। चरित एक प्रभु देखिअ जाई॥
धनुषजग्य सुनि रघुकुल नाथा। हरषि चले मुनिबर के साथा॥५॥
आश्रम एक दीख मग माहीं। खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं॥
पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी। सकल कथा मुनि कहा बिसेषी॥६॥

दो.

गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।
चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर॥२१०॥


छं.
परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही।
देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होइ कर जोरि रही॥
अति प्रेम अधीरा पुलक सरीरा मुख नहिं आवै बचन कही।
अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही॥१॥
जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी।
सोई पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी॥
एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी।
जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पतिलोक अनंद भरी॥४॥


चौ.
चले राम लछिमन मुनि संगा। गए जहाँ जग पावनि गंगा॥१ (क)॥
तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाए। बिबिध दान महिदेवन्हि पाए॥
हरषि चले मुनि बृंद सहाया। बेगि बिदेह नगर निअराया॥२॥
पुर रम्यता राम जब देखी। हरषे अनुज समेत बिसेषी॥३ (क)॥

दो.
सुमन बाटिका बाग बन बिपुल बिहंग निवास।
फूलत फलत सुपल्लवत सोहत पुर चहुँ पास॥२१२॥


चौ.
समय जानि गुर आयसु पाई। लेन प्रसून चले दोउ भाई॥१ (ख)॥
मध्य बाग सरु सोह सुहावा। मनि सोपान बिचित्र बनावा॥४ (क)॥

दो.
बागु तड़ागु बिलोकि प्रभु हरषे बंधु समेत।
परम रम्य आरामु यहु जो रामहि सुख देत॥२२७॥


चौ.
चहुँ दिसि चित‍इ पुँछि मालीगन। लगे लेन दल फूल मुदित मन॥
तेहि अवसर सीता तहँ आई। गिरिजा पूजन जननि पठाई॥१॥
संग सखीं सब सुभग सयानीं। गावहिं गीत मनोहर बानीं॥२ (क)॥
एक सखी सिय संगु बिहाई। गई रही देखन फुलवाई॥
तेहिं दो‍उ बंधु बिलोके जाई। प्रेम बिबस सीता पहिं आई॥४॥
सुनि हरषीं सब सखीं सयानी। सिय हियँ अति उतकंठा जानी॥२ (क)॥
तासु बचन अति सियहि सोहाने। दरस लागि लोचन अकुलाने॥
चली अग्र करि प्रिय सखि सोई। प्रीति पुरातन लख‍इ न कोई॥४॥

दो.
सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत।
चकित बिलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत॥२२९॥


चौ.
कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि॥
मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही। मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही॥१॥
अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा। सिय मुख ससि भए नयन चकोरा॥
भए बिलोचन चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल॥२॥
देखि सीय सोभा सुखु पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा॥३ (क)॥
सुंदरता कहुँ सुंदर कर‍ई। छबिगृहँ दीपसिखा जनु बर‍ई॥४ (क)॥

दो.
सिय सोभा हियँ बरनि प्रभु आपनि दसा बिचारि।
बोले सुचि मन अनुज सन बचन समय अनुहारि॥२३०॥

  चौ. तात जनकतनया यह सोई। धनुषजग्य जेहि कारन होई॥ पूजन गौरि सखीं लै आईं। करत प्रकासु फिर‍इ फुलवाईं॥१॥
जासु बिलोकि अलौकिक सोभा। सहज पुनीत मोर मनु छोभा॥
सो सबु कारन जान बिधाता। फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता॥२॥
रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु धर‍इ न काऊ॥
मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी। जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी॥३॥

दो.
करत बतकही अनुज सन मन सिय रूप लोभान।
मुख सरोज मकरंद छबि कर‍इ मधुप इव पान॥२३१॥


चौ.
चितवति चकित चहूँ दिसि सीता। कहँ गए नृपकिसोर मनु चिंता॥
जहँ बिलोक मृग सावक नैनी। जनु तहँ बरिस कमल सित श्रेनी॥१॥
लता ओट तब सखिन्ह लखाए। स्यामल गौर किसोर सुहाए॥
देखि रूप लोचन ललचाने। हरषे जनु निज निधि पहिचाने॥२॥
थके नयन रघुपति छबि देखें। पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें॥३ (क)॥
लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी॥४ (क)॥

दो.
लताभवन तें प्रगट भे तेहि अवसर दो‍उ भा‍इ।
निकसे जनु जुग बिमल बिधु जलद पटल बिलगा‍इ॥२३२॥


चौ.
धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता सन बोली गहि पानी॥
बहुरि गौरि कर ध्यान करेहू। भूपकिसोर देखि किन लेहू॥१॥
सकुचि सीयँ तब नयन उघारे। सनमुख दो‍उ रघुसिंघ निहारे॥२ (क)॥
परबस सखिन्ह लखी जब सीता। भय‍उ गहरु सब कहहिं सभीता॥
पुनि आवउब एहि बेरिआँ काली। अस कहि मन बिहसी एक आली॥३॥
धरि बड़ि धीर रामु उर आने। फिरी अपनप‍उ पितुबस जाने॥४ (ख)॥

दो.
देखन मिस मृग बिहग तरु फिर‍इ बहोरि बहोरि।
निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़‍इ प्रीति न थोरि॥२३४॥

Baalkaand - Part II

बालकाण्ड - २


मंगल भवन अमंगल हारी।
द्रवहु सुदसरथ अचर बिहारी॥



चौ.
ग‍ई भवानी भवन बहोरी। बंदि चरन बोली कर जोरी॥२ (ख)॥
जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी॥
जय गजबदन पडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता॥३॥
मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबहि कें॥२ (क)॥
बिनय प्रेम बस भ‍ई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी॥
सादर सियँ प्रसादु सिर धरे‍ऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरे‍ऊ॥३॥
सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी॥४ (क)॥


छं.
मनु जाहिं रोचे‍उ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो।
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥


चौ.
हृदयँ सराहत सीय लोना‍ई। गुर समीप गवने दो‍उ भा‍ई॥१ (क)॥
सुमन पा‍इ मुनि पूजा कीन्ही। पुनि असीस दुहु भा‍इन्ह दीन्ही॥
सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भ‍ए सुखारे॥२॥
सतानंदु तब जनक बोला‍ए। कौसिक मुनि पहिं तुरत पठा‍ए॥५ (क)॥
पुनि मुनिबृंद समेत कृपाला। देखन चले धनुषमख साला॥२ (ख)॥

दो.
सब मंचन्ह तें मंचु एक सुंदर बिसद बिसाल।
मुनि समेत दो‍उ बंधु तहँ बैठारे महिपाल॥२४४॥

जानि सु‍अवसरु सीय तब पठ‍ई जनक बोला‍इ।
चतुर सखीं सुंदर सकल सादर चलीं लवा‍इ॥२४६॥


चौ.
चलिं संग लै सखीं सयानी। गावत गीत मनोहर बानी॥१ (क)॥
रंगभूमि जब सिय पगु धारी। देखि रूप मोहे नर नारी॥२ (ख)॥
पानि सरोज सोह जयमाला। अवचट चित‍ए सकल भु‍आला॥३ (ख)॥
सीय चकित चित राम्हि चाहा। भ‍ए मोहबस सब नरनाहा॥
मुनि समीप देखे दो‍उ भा‍ई। लगे ललकि लोचन निधि पा‍ई॥४॥

दो.
गुरजन लाज समाजु बड़ देखि सीय सकुचानि।
लागि बिलोकन सखिन्ह तन रघुबीरहि उर आनि॥२४८॥

बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल।
पन बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठा‍इ बिसाल॥२४९॥


चौ.
नृप भुजबलु बिधु सिवधनु राहू। गरु‍अ कठोर बिदित सब काहू॥
रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरासन गवँहिं सिधारे॥१॥
सो‍इ पुरारि कोदंडु कठोरा। राज समाज आजु जो‍इ तोरा॥
त्रिभुवन जय समेत बैदेही। बिनहिं बिचार बर‍इ हठि तेही॥२॥
सुनि पन सकल भूप अभिलाषे। भठमानी अतिसय मन माखे॥
परिकर बाँधि उठे अकुला‍ई। चले इष्टदेवन्ह सिर ना‍ई॥३॥

दो.
तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठ‍इ न चलहिं लजा‍इ।
मनहुँ पा‍इ भठ बाहुबलु अधिकु अधिकु गरु‍आ‍इ॥२५०॥


चौ.
भूप सहस दस एकहि बारा। लगे उठावन टर‍इ न टारा॥
डगै न संभु सरासनु कैसें। कामी बचन सती मनु जैसें॥१॥
श्रीहत भ‍ये हारि हियँ राजा। बैठे निज निज जा‍इ समाजा॥
नृपन्ह बिलोकि जनकु अकुलाने। बोले बचन रोष जनु साने॥३॥
दीप दीप के भूपति नाना। आ‍ए सुनि हम जो पनु ठाना॥४ (क)॥

दो.
कु‍अँरि मनोहर बिजय बड़ि कीरति अति कमनीय।
पावनिहार बिरंचि जनु रचे‍उ न धनु दमनीय॥२५१॥


चौ.
अब जनि को‍उ माखै भट मानी। बीर बिहीन मही मैं जानी॥
तजहु आस निज निज गृह जाहू। लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू॥२॥
सुकृतु जा‍इ जौं पनु परिहर‍ऊँ। कु‍अँरि कु‍आरि रह‍उ का कर‍उँ॥
जौं जनते‍उँ बिनु भट भुबि भा‍ई। तौ पनु करि होते‍उँ न हँसा‍ई॥३॥
बिस्वामित्र समय सुभ जानी। बोले अति सनेहमय बानी॥
उठहु राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा॥३॥
सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा। हरषु बिषादु न कछु उर आवा॥
ठाढ़े भ‍ए उठि सहज सुभा‍एँ। ठवनि जुवा मृगराजु लजा‍एँ॥४॥

दो.
उदित उदयगिरि मंच पर रघुबर बालपतंग।
बिकसे संत सरोज सब हरषे लोचन भृंग॥२५४॥


चौ.
तब रामहि बिलोकि बैदेही। सभय हृदयँ बिनवति जेहि तेही॥२ (ख)॥
मनहीं मन मनाव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेस भवानी॥
करहु सफल आपनि सेवका‍ई। करि हितु हरहु चाप गरु‍आ‍ई॥३॥
गननायक बरदायक देवा। आजु लगें कीन्हिउँ तु‍अ सेवा॥
बार बार बिनति सुनि मोरी। करहु चाप गुरुता अति थोरी॥४॥

दो.
देखि देखि रघुबीर तन सुर मनाव धरि धीर।
भरे बिलोचन प्रेम जल पुलकावली सरीर॥२५७॥


चौ.
सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी। धरि धिरजु प्रतीति उर आनी॥
तन मन बचन मोर पनु साचा। रघुपति पद सरोज चितु राचा॥२॥
तौ भगवानु सकल उर बासी।करिहि मोहि रघुबर कै दासी॥
जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलै न कछु संदेहू॥३॥
प्रभु तन चितै प्रेम तन ठाना। कृपानिधान राम सबु जाना॥
सियहि बिलोकि तके‍उ धनु कैसें। चितव गरुरु लघु ब्यालहि जैसें॥४॥

दो.
राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि।
चित‍ई सीय कृपायतन जानी बिकल बिसेषि॥२६०॥


चौ.
देखी बिपुल बिकल बैदेही। निमिष बिहात कलप सम तेही॥१ (क)॥
का बरषा सब कृषी सुखानें। समय चुकें पुनि का पछितानें॥२ (क)॥
गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा। अति लाघवँ उठा‍इ धनु लीन्हा॥३ (क)॥
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा॥४ (ख)॥
प्रभु दो‍उ चापखंड महि डोरे। देखि लोग सब भ‍ए सुखारे॥१ (क)॥
रही भुवन भरि जय जय बानी। धनुषभंग धुनि जात न जानी॥
मुदित कहहिं जहँ तहँ नर नारी। भंजे‍उ राम संभुधनु भारी॥४॥
सखिन्ह सहित हरषी अति रानी। सुखत धान परा जनु पानी॥२ (क)॥
सतानंद तब आयेसु दीन्हा। सीताँ गमनु राम पहिं कीन्हा॥४ (ख)॥
गावहिं छबि अवलोकि सहेली। सियँ जयमाल राम उर मेली॥४ (ख)॥

सो.

रघुबर उर जयमाल देखि देव बरिसिंह सुमन।
सकुचे सकल भु‍आल जनु बिलोकि रबि कुमुदगन॥ २६४॥


चौ.
पुर अरु ब्योम बाजने बाजे। खल भ‍ये मलिन साधु सब राजे॥
सुर किंनर नर नाग मुनीसा। जय जय जय कहि देहिं असीसा॥१॥




मंगल भवन अमंगल हारी।
द्रवहु सुदसरथ अचर बिहारी॥




चौ.
तेहिं अवसर सुनि सिव धनु भंगा। आय‍उ भृगुकुल कमल पतंगा॥१ (ख)॥
देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भु‍आला॥
पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥१॥
जनक बहोरि आ‍इ सिरु नावा। सीय बोला‍इ प्रनामु करावा॥२ (ख)॥
बिस्वामित्रु मिले पुनि आ‍ई। पद सरोज मेले दो‍उ भा‍ई॥३ (ख)॥
रामहि चित‍इ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन॥४ (ख)॥
अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥
बेगि देखा‍उ मूढ़ न त आजू। उलट‍उँ महि जहँ लहि तव राजू॥२॥
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥
सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥३॥
मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥
भृगुपति कर सुभा‍उ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता॥४॥

दो.

सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।
हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥२७०॥


चौ.
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। हो‍इहि के‍उ एक दास तुम्हारा॥
आयेसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसा‍इ बोले मुनि कोही॥१॥
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥२ (ख)॥
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अवमाने॥३ (ख)॥
बहु धनुहीं तोरीं लरिका‍ईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसा‍ईं॥
एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसा‍इ कह भृगुकुलकेतू॥४॥

दो.
रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥२७१॥


चौ.
लखन कहा हँसि हमरें जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना॥१ (क)॥
छु‍अत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करि‍अ कत रोसू॥
बोले चितै परसु कि ओरा। रे सठ सुनेहि सुभा‍उ न मोरा॥२॥
बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महा भटमानी॥
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारु। चहत उड़ावन फूँकि पहारू॥१॥

दो.
लखन उतर आहुति सरिस भृगुबर कोपु कृसानु।
बढ़त देखि जल सम बचन बोले रगुकुलभानु॥२७६॥


चौ.
सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना। बालक बचनु करि‍अ नहिं काना॥१ (ख)॥
छमहु चूक अनजानत केरी। चहि‍अ बिप्र उर कृपा घनेरी॥२ (ख)॥
बिप्रबंस कै असि प्रभुता‍ई। अभय हो‍इ जो तुम्हहि डेरा‍ई॥
सुनि मृदु गूढ़ बचन रघुपति के। उघरे पटल परसुधर मति के॥३॥
राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू॥
देत चपु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिस्मय भय‍ऊ॥४॥

दो.
जाना राम प्रभा‍उ तब पुलक प्रफुल्लित गात।
जोरि पानि बोले बचन हृदयँ न प्रेमु अमात॥२८४॥


चौ.
जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानू॥
जय सुर बिप्र धेनु हितकारी। जय मद मोह कोह भ्रम हारी॥१॥
करौं काह मुख एक प्रसंसा। जय महेस मन मानस हंसा॥
अनुचित बहुत कहे‍उँ अज्ञाता। क्षमहु क्षमामंदिर दो‍उ भ्राता॥३॥
कहि जय जय जय रघुकुलकेतू। भृगुपति ग‍ये बनहि तप हेतू॥४ (क)॥

दो.
देवन्ह दीन्हीं दुंदुभीं प्रभु पर बरषहिं फूल।
हरषे पुर नर नारि सब मिटी मोहमय सूल॥२८५॥


चौ.
जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा। प्रभु प्रसाद धन भंजे‍उ रामा॥
मोहि कृतकृत्य कीन्ह दुहुँ भा‍ई। अब जो उचित सो कहि‍अ गोसा‍ईं॥३॥
कह मुनि सुनु नरनाथ प्रबीना। रहा बिवाहु चाप आधीना॥
टूटतहीं धनु भयेउ बिवाहू। सुर नर नाग बिदित सब काहू॥४॥

दो.
तदपि जा‍इ तुम्ह करहु अब जथा बंस ब्यवहारु।
बूझि बिप्र कुलबृद्ध गुर बेद बिदित आचारु॥२८६॥


चौ.
दुत अवधपुर पठवहु जा‍ई। आनहिं नृप दसरथहि बोला‍ई॥
मुदित रा‍उ कहि भलेहिं कृपाला। पठ‍ए दूत बोलि तेहि काला॥१॥
बहुरि महाजन सकल बोला‍ए। आ‍इ सबन्हि सादर सिर ना‍ए॥
हाट बाट मंदिर सुरबासा। नगरु सँवारहु चारिहुँ पासा॥२॥
रचहु बिचित्र बितान बना‍ई। सिर धरि बचन चले सचु पा‍ई॥३ (ख)॥
बिधिहि बंदि तिन्ह कीन्ह अरंभा। बिरचे कनक कदलि के खंभा॥४ (ख)॥

दो.
हरित मनिन्ह के पत्र फल पदुमराग के फूल।
रचना देखि बिचित्र अति मनु बिरंचि कर भूल॥२८७॥


चौ.
सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना। बरषहिं सुमन बजा‍इ निसाना॥
सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा। चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा॥१॥
प्रेम पुलक तन हृदयँ उछाहू। चले बिलोकन राम बिआहू॥
देखि जनकपुरु सुर अनुरागे। निज निज लोक सबहिं लघु लागे॥२॥

दो.
सजि आरती अनेक बिधि मंगल सकल सँवारि।
चलीं मुदित परिछनि करन गजगामिनि बर नारि॥३१७॥


चौ.
नयन नीरु हटि मंगल जानी। परिछनि करहिं मुदित मन रानी॥१ (क)॥
करि आरती अरघु तिन्ह दीन्हा। राम गमनु मंडप तब कीन्हा॥२ (ख)॥
समयँ समयँ सुर बरषहिं फूला। सांति पढ़हिं महिसुर अनुकूला॥३ (ख)॥
येहि बिधि रामु मंडपहिं आये। अरघु दे‍इ आसन बैठा‍ये॥४ (ख)॥


छं.
बैठारि आसन आरती करि निरखि बरु सुखु पावहीं।
मनि बसन भूषन भूरि वारहिं नारि मंगल गावहीं॥
ब्रह्मादि सुरबर बिप्र बेष बना‍इ कौतुक देखहीं।
अवलोकि रघुकुल कमल रबि छबि सुफल जीवन लेखहीं॥

मंडपु बिलोकि बिचित्र रचनाँ रुचिरताँ मुनि मन हरे।
निज पानि जनक सुजान सब कहुँ आनि सिंघासन धरे॥
कुल इष्ट सरिस बसिष्ट पूजे बिनय करि आसिष लही।
कौसिकहि पूजत परम प्रीति कि रीति तौ न परै कही॥


चौ.
कु‍अँरु कु‍अँरि कल भावँरि देहीं। नयन लाभु सब सादर लेहीं॥१ (क)॥
राम सीय सुंदर प्रतिछाहीं। जगमगात मनि खंभन माहीं॥
मनहुँ मदन रति धरि बहु रूपा। देखत राम बि‍आहु अनूपा॥२॥
रामु सीय सिर सेंदुर देहीं। सोभा कहि न जाति बिधि केहीं॥४॥


छं.
भरि भुवन रहा उछाहु राम बिबाहु भा सबहीं कहा।
केहि भाँति बरनि सिरात रसना एक यहु मंगलु महा॥१ (ख)॥
तब जनक पा‍इ बसिष्ठ आयसु ब्याह साज सँवारि कै।
मांडवी श्रुतकीरति उरमिला कु‍अँरि ल‍ईं हँकारि कै॥
कुसकेतु कन्या प्रथम जो गुन सील सुख सोभाम‍ई।
सब रीति प्रीति समेत करि सो ब्याहि नृप भरतहि द‍ई॥२॥
जानकी लघु भगिनी सकल सुंदरि सिरोमनि जानि कै।
सो तनय दीन्ही ब्याहि लखनहि सकल बिधि सनमानि कै॥
जेहि नामु श्रुतकीरति सुलोचनि सुमुखि सब गुन आगरी।
सो द‍ई रिपुसूदनहि भूपति रूप सील उजागरी॥३॥


दो.

सहित बधूटिन्ह कु‍अँर सब तब आ‍ए पितु पास।
सोभा मंगल मोद भरि उमगे‍उ जनु जनवास॥३२७॥


चौ.
चली बरात निसान बजा‍ई। मुदित छोट बड़ सब समुदा‍ई॥४ (क)॥
जहँ तहँ राम ब्याहु सबु गावा। सुजसु पुनीत लोक तिहुँ छावा॥२ (ख)॥
आ‍ए ब्याहि रामु घर जब तें। बस‍इ अनंद अवध सब तब तें॥३ (क)॥


इति श्रीमद्रामचरितमानसे  सकलकलिकलुषविध्वंसने प्रथमः सोपानः समाप्तः।